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गुस्सा नहीं, भावनात्मक जुड़ाव लाएगा बच्चों में बदलाव

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बच्चे सुनते नहीं, गुस्सा करते हैं, टीवी, मोबाइल, गेमिंग में लगे रहते हैं। माता-पिता बच्चों को समझाते, धमकाते, और कई बार मारपीट करते हैं पर हालात में सुधार नहीं आता। यह घर-घर की कहानी है। अभिभावक परेशान रहते हैं कि करें तो क्या करें…बच्चे बात ही नहीं मानते। वे तय नहीं कर पाते कि कहां कमी रह गई। वे अपने बचपन के अनुभव के आधार पर-जैसी उनकी परवरिश हुई, धमकाकर, समझाकर या लालच देकर बच्चे में सुधार लाना चाहते हैं, पर वह कारगर साबित नहीं होता।

दरअसल आप अपने करियर में बहुत सफल उद्योगपति, अधिकारी, डॉक्टर, इंजीनियर या कुछ भी और हो सकते हैं लेकिन करियर की सफलता और बात है और पेरेंटिंग अलग। प्रोफेशनल सक्सेस और समझ परेंटिंग में काम नहीं आती। आप पूछेंगे फिर क्या करें। यहां हम इसे पर बात करेंगे।

जबरन बदलाव की कोशिश ना करें

बच्चा वही करता है जो वह सही समझता है। उसका बर्ताव अपने विश्वास के मुताबिक ही होता है। यही कारण है कि आपका रोकना-टौकना, धमकाना बेअसर रहता है। आप यदि बच्चे को डांटेंगे, धमकाएंगे तो आप बच्चे से दूर हो जाएंगे। डर से एक बार वह आपकी बात मान भी ले पर यह स्थायी नहीं होगा। इसके अलावा आप ही सोचिए जिस बच्चे के साथ आप मारपीट कर रहे हैं, कल क्या उसके मन में आपके लिए प्यार और सम्मान होगा। वह जब बड़ा होगा और आप बूढ़े तो वह भी आपसे सख्ती से ही पेश आएगा यानी वैसा ही बर्ताव करेगा जैसा आप कर रहे हैं।

ऐसे आएगा बदलाव

बदलाव की प्रक्रिया को हम एक उदाहरण से समझते हैं। कोई खूब गुटखा खाता है। उसको भी पता है कि इससे कैंसर हो सकता है लेकिन वह फिर भी खाता है। लेकिन एक दिन गुटखा खाने वाला उसका खास दोस्त कैंसर से चल बसता है। अचानक उसमें बदलाव आता है और वह गुटखा खाना छोड़ देता है। दरअसल यह बदलाव इसलिए आता है क्यों कि वह अपने दोस्त से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ था।

शुरुआत खुद से करनी होगी

हम ओरिजनल कॉपी हैं और बच्चा हमारी दूसरी कॉपी। वह हमको देखकर कॉपी करता है। इसलिए हम अपने बच्चे को जैसा बनाना चाहते हैं, पहले हम बनें। बच्चे में बदलाव चाहते हैं तो शुरूआत खुद से करनी होगी। मिसाल के लिए यदि कोई काम आपकी पसंद के मुताबिक नहीं होता है तो आप गुस्सा जाहिर करते हैं। मानकर चलें कि बच्चे के मन की नहीं होगी तो वह भी ऐसा ही करेगा।

बच्चों से जुड़ें

बच्चा आपकी बात सुने और माने इसके लिए आपस में भावनात्मक जुड़ाव सबसे जरूरी है। आपका बच्चे से इमोशनल कनेक्शन होगा तो उसके मन में स्वाभाविक प्यार और सम्मान होगा और वह आपकी जरूर सुनेगा। आप पूछेंगे, यह जुड़ाव बनेगा कैसे।

इसके लिए जरूरी है कि बच्चे को समय दें। रोज 20 से 30 मिनट वह काम करें जिससे वह बच्चा भावनात्मक रूप से जुड़ा है-जैसे उससे बातें करना, उसके साथ किताबें पढऩा, उसकी पसंद की फिल्म देखना, अंताक्षरी या कुश्ती, लुका-छिपी, पिलो फाइटिंग जो भी उसको अच्छा लगता हो, वह करें। यह बच्चे और आपके बीच जरूर प्यारा सा रिश्ता जगाएगा।

अपने झगड़े अकेले में निपटाएं

बच्चे के लिए आप आइडल हैं या कहें कि आप उसके भगवान की तरह हैं। उसके सामने बहस, झगड़ा ना करें। इससे उसे बुरा महसूस होगा। उसके मन में आपके लिए सम्मान नहीं रहेगा। जरूरी है कि मम्मी पापा एक टीम में नजर आएं। ज्यादातर परिवारों में होता यह है कि मम्मी मना करती है तो पापा डिमांड पूरी कर देते हैं। मम्मी-पापा सख्ती दिखाते हैं तो दादा-दादी या दूसरे बड़े बच्चों की मांग पूरी कर देते हैं।

ऐसे में होता यह है कि घर में बड़े एक दूसरे पर आरोप लगाने लगते हैं कि आपकी वजह से बच्चा बिगड़ रहा है। बड़ों ऐसा बर्ताव बच्चों के जीवन की लय बिगाड़ता है। परिवार में तालमेल जरूरी है। याद रखें-कौन सही है, यह इतना महत्वपूर्ण नहीं है। जरूरी यह है कि बच्चे के लिए क्या सही है।

पढ़ाई को लेकर दबाव नहीं बनाएं

आप ही क्या कोई अभिभावक पसंद नहीं करगा कि बच्चा 100 फीसदी नम्बर लाए पर उनका सम्मान नहीं करे, उनसे प्यार नहीं करें। आप बच्चे को पढ़ाई की अहमियत तो बताएं पर इसके लिए दबाव नहीं बनाएं। उसे समझाएं कि फोकस रहकर पूरी कोशिश करे तो उसके बाद जो भी हासिल होगा, वह आपको सहज स्वीकार होगा। आपका मकसद केवल यही होना चाहिए कि बच्चा जिंदगी में आत्मनिर्भर बने, खुश रहे। इसके लिए उसको व्यक्तिगत, पारिवारिक, करियर, सामाजिक जिंदगी में संतुलन साधने की कला सिखाएं।

जमान बदल रहा, आप भी बदलें

सूचना क्रांति ने बचपन को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। समय बदला है तो पैरेंटिंग का तरीका भी बदला है। आज बच्चे टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल के साथ बड़े हो रहे हैं। आप मानकर चलें आपके समय के मुकाबले आज बच्चों के पास जानकारी बहुत अधिक है। आज पैरेटिंग टीम वर्क है। सतत सीखने की प्रक्रिया है। लर्निंग-टीचिंग को तैयार रहें।

आपका बच्चा दुनिया में सबसे अच्छा, आप बेस्ट मम्मी पापा

सभी मानते हैं कि बच्चा हमको ईश्वर का दिया तोहफा है। आप ही सोचें जब हम किसी को किसी खास मौके पर कुछ छोटी-मोटी भेंट देते हैं तो तोहफे को भली-भांति जांच परख कर ही देते हैं। फिर वह तो दुनिया बनाने वाला जगत नियंता है। उसने आपको बच्चा तोहफे में दिया तो मानकर चलें कि आपको जो दिया दिया, उससे सबसे बेहतर आपके लिए कुछ नहीं हो सकता। आपके पास जो है वह दुनिया का बेस्ट बच्चा है। इसी प्रकार ईश्वर ने आपको बच्चे के माता पिता की भूमिका में चुना है तो उसके लिए भी आपसे बेहतर मम्मी-पापा भी और कोई नहीं हो सकते।

 

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